
नई दिल्ली/संवाददाता। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के साथ ही शारदीय नवरात्रि का सबसे ऊर्जावान और भक्तिमय दौर शुरू हो चुका है। आज नवरात्रि का सातवां दिन है, जिसे महासप्तमी के रूप में पूरे देश में बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। आज का यह पावन दिन आदि-शक्ति मां दुर्गा के सातवें और सबसे उग्र स्वरूप ‘मां कालरात्रि ( को समर्पित है। सनातन परंपरा में महासप्तमी की रात्रि का तांत्रिक और आध्यात्मिक, दोनों ही दृष्टियों से विशेष महत्व माना गया है। मां का यह रूप भले ही देखने में अत्यंत भयानक प्रतीत होता है, परंतु अपने भक्तों के लिए वे सदैव शुभ फल देने वाली हैं, इसी कारण उन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है।
महासप्तमी के शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय
महासप्तमी के पावन अवसर पर मां कालरात्रि की पूजा और साधना के लिए पंचांग के अनुसार विशेष मुहूर्त निर्धारित हैं। इस समय अवधि में की गई पूजा का अक्षय फल प्राप्त होता है:•
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:49 बजे से 12:35 बजे तक। (यह समय किसी भी मांगलिक और धार्मिक अनुष्ठान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है)।•
अमृत काल मुहूर्त: रात्रि 02:34 बजे से भोर 04:22 बजे तक (तंत्र साधना और विशेष मंत्र जाप के लिए अति उत्तम)।•
राहुकाल (वर्जित समय): सुबह 09:20 बजे से 10:46 बजे तक। शास्त्रों के अनुसार, राहुकाल के दौरान नया या विशेष पूजा अनुष्ठान शुरू करने से बचना चाहिए।
अंधकार और भय की संहारक: मां कालरात्रि का स्वरूपशास्त्रों में वर्णित मां कालरात्रि ( का स्वरूप अद्वितीय है। इनका वर्ण सघन अंधकार की भांति काला है और इनके केश बिखरे हुए हैं। मां के गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला सुशोभित है। इनके तीन नेत्र ब्रह्मांड की तरह विशाल और गोल हैं, जिनसे निरंतर दिव्य किरणें निकलती रहती हैं। मां की नासिका से श्वास-प्रश्वास के साथ अग्नि की भयंकर ज्वालाएं निकलती हैं। गर्दभ (गधा) पर सवार रहने वाली माता की चार भुजाएं हैं, जिनमें एक हाथ में खड्ग (तलवार), दूसरे में लौह अस्त्र, तीसरा हाथ अभयमुद्रा में और चौथा वरमुद्रा में भक्तों को आशीष देता है। मां कालरात्रि का यह रौद्र रूप इस बात का प्रतीक है कि समय आने पर बुराई और अन्याय का अंत कितना भयानक होता है।
पौराणिक कथा: जब रक्तबीज के संहार के लिए देवी ने धारण किया यह रूपमार्कंडेय पुराण के अंतर्गत वर्णित देवी महात्म्य के अनुसार, पुरातन काल में शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज नाम के महाशक्तिशाली राक्षसों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। उनके अत्याचारों से त्रस्त होकर इंद्रदेव समेत सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। भगवान शिव के परामर्श पर देवताओं ने भगवती महादेवी से रक्षा की गुहार लगाई।इसके बाद माता पार्वती ने शुंभ-निशुंभ के वध के लिए अपने स्वर्णिम वर्ण को त्याग कर अत्यंत उग्र रूप धारण किया, जिसे मां कालरात्रि (कहा गया। जब रणभूमि में देवी का सामना रक्तबीज से हुआ, तो एक नई चुनौती उठ खड़ी हुई। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से खून की एक भी बूंद जैसे ही धरती पर गिरेगी, उससे उसी के समान पराक्रमी दूसरा राक्षस पैदा हो जाएगा। युद्ध के मैदान में जैसे ही देवी उसका लहू बहातीं, हजारों नए रक्तबीज पैदा हो जाते।स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मां कालरात्रि ने महाभयानक रूप विस्तार किया। उन्होंने अपनी जिह्वा को अत्यधिक फैला दिया। अब देवी जैसे ही रक्तबीज पर प्रहार करतीं, उसके घाव से निकलने वाले खून को धरती पर गिरने से पहले ही अपने मुख में समेट लेतीं। रक्त की बूंदों से पैदा होने वाले राक्षसों को भी वे मुख का ग्रास बना लेतीं। इस तरह देवी ने रक्तबीज के खून की एक भी बूंद ज़मीन पर नहीं गिरने दी और उसका रक्त पीते हुए उस महाक्रूर राक्षस का अंत कर दिया। रक्तबीज के वध के बाद ही देवताओं को उसके भय और आतंक से मुक्ति मिली।मां कालरात्रि के सिद्ध मंत्रमहासप्तमी के दिन मां कालरात्रि की पूजा करते समय इन प्रभावशाली मंत्रों का जाप करने से जीवन के सभी संकट टल जाते हैं:•
प्रार्थना मंत्र:या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥•
बीज मंत्र:ॐ ऐं ह्रीं क्लीं काल ये नमः॥• पूजन मंत्र:दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥
मां कालरात्रि की आरती
कालरात्रि जय जय महाकाली। काल के मुंह से बचाने वाली॥
दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा। महा चंडी तेरा अवतारा॥
पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥
खड्ग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥
कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब जगह देखूं तेरा नजारा॥सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥
रक्तदंता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥
ना कोई चिंता रहे बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥
उस पर कभी कष्ट ना आवें। महाकाली मां जिसे बचावे॥
तू भी भक्त प्रेम से कह। कालरात्रि मां तेरी जय॥
आज की पूजा और साधना का सामाजिक महत्वज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, मां कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं। इसलिए आज के दिन माता की पूजा करने से शनि जनित दोष, साढ़ेसाती और ढैया के कुप्रभावों से मुक्ति मिलती है। आज के दिन मां को प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा है। आधुनिक समाज में मां का यह रूप हमें सिखाता है कि हमारे भीतर छुपे काम, क्रोध, लोभ और अहंकार रूपी विकारों (रक्तबीज) को हमें अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से समूल नष्ट करना होगा, तभी समाज और व्यक्ति का वास्तविक कल्याण संभव है।
