
। शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व अपनी पूर्ण दिव्यता के साथ गतिमान है। आज नवरात्रि के पांचवें दिन (पंचमी तिथि) देश भर के विख्यात शक्तिपीठों, प्राचीन मंदिरों और भव्य पूजा पंडालों में सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। आज का दिन आदिशक्ति माँ दुर्गा के पंचम स्वरूप माँ स्कंदमाता की उपासना को समर्पित है। सनातन परंपरा में देवी का यह स्वरूप परम वात्सल्य, ज्ञान और सैन्य शक्ति का अनूठा समन्वय माना जाता है।शास्त्रों के अनुसार, देवताओं के सेनापति और दुष्ट तारकासुर का वध करने वाले भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें ‘स्कंदमाता’ नाम से संबोधित किया जाता है।
सिंह पर सवार चार भुजाधारी देवी के इस अलौकिक विग्रह में वे अपनी गोद में बाल रूप में भगवान स्कंद को थामे हुए हैं, दो हाथों में कमल पुष्प धारण करती हैं और एक हाथ से भक्तों को अभय प्रदान करती हैं।
पौराणिक कथा: जब जगत कल्याण के लिए देवी बनीं सेनापति की मातामाँ स्कंदमाता के स्वरूप और अवतरण के पीछे एक अत्यंत प्रेरणादायी पौराणिक कथा है। शास्त्रों के अनुसार, तक्षक का पौत्र तारकासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस था। उसने कठिन तपस्या करके ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसकी मृत्यु केवल शिवपुत्र के हाथों ही संभव होगी। तारकासुर जानता था कि सती के आत्मदाह के बाद भगवान शिव घोर तपस्या में लीन हैं, इसलिए उसने सोचा कि शिव का विवाह और पुत्र होना असंभव है। इस अहंकार में चूर होकर उसने देवलोक पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया।चारों ओर हाहाकार मचने के बाद सभी देवता व्याकुल होकर भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं की प्रार्थना पर शिव और माता पार्वती का मिलन हुआ और उनके तेज से भगवान स्कंद (कार्तिकेय) का जन्म हुआ। परंतु, बाल्यकाल में भगवान स्कंद को युद्ध कला और सैन्य संचालन में निपुण करने के लिए स्वयं माता पार्वती ने उन्हें प्रशिक्षित किया।जब तारकासुर के साथ युद्ध का समय आया, तो माता पार्वती ने अपने पुत्र स्कंद को युद्ध का नेतृत्व सौंपने के लिए खुद को उनकी माता के रूप में प्रतिष्ठित किया। माँ के इसी ममतामयी और मार्गदर्शक स्वरूप की छत्रछाया में रहकर कुमार कार्तिकेय ने देवताओं की सेना का सेनापतित्व संभाला और भीषण युद्ध में महाबलशाली राक्षस तारकासुर का वध कर चराचर जगत को उसके आतंक से मुक्त कराया। तभी से माता का यह स्वरूप ‘स्कंदमाता’ कहलाया, जो अपने भक्तों के भीतर छिपे असुरों (बुराइयों) का नाश करने की प्रेरणा देता है।आध्यात्मिक महत्व और अलौकिक प्रभावयोग और साधना की दृष्टि से नवरात्रि की पंचमी तिथि का विशेष स्थान है। आज के दिन साधक का मन ‘विशुद्ध चक्र’ में प्रवेश करता है। इस चक्र के जाग्रत होने से मनुष्य की चेतना बाह्य जगत से उठकर अंतर्मुखी होने लगती है, जिससे वाणी में ओज, बुद्धि में प्रखरता और चित्त में असीम शांति का संचार होता है। मान्यता है कि जो भक्त निष्काम भाव से माँ स्कंदमाता की शरण में आते हैं, उन्हें न केवल सांसारिक सुख और संतान सुख की प्राप्ति होती है, बल्कि मोक्ष का मार्ग भी सुलभ हो जाता है।विशेष पूजन विधान और पीला रंगवेबसाइट के सुधी पाठकों और श्रद्धालुओं के लिए आज के दिन का पूजन विधान भी अत्यंत विशिष्ट है। पंचमी तिथि के अवसर पर पीले रंग के उपयोग का विशेष विधान है, जो उत्साह, समृद्धि और पवित्रता का परिचायक है। आज के दिन माता को प्रिय केले का भोग अर्पित किया जाता है। इसके अतिरिक्त पंचमेवा और पीली कलाकंद का प्रसाद चढ़ाना भी उत्तम माना गया है।वर्तमान में मध्य प्रदेश के प्रमुख धार्मिक केंद्रों सहित देश भर के शक्तिपीठों में सुरक्षा और सुचारू दर्शन के लिए प्रशासन द्वारा पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। संध्याकाल में महाआरती और विशेष सांस्कृतिक आयोजनों के साथ पंचमी तिथि का यह अनुष्ठान संपन्न होगा।
वात्सल्य, ज्ञान और शौर्य की अधिष्ठात्री देवी माँ स्कंदमाता की कृपा आप सभी पर बनी रहे। नवरात्रि के इस पावन पंचम दिवस की कोटिशः शुभकामनाएं।
