
अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के साथ ही शारदीय नवरात्रि (का सबसे पावन और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण दौर आ चुका है। आज नवरात्रि का आठवां दिन है, जिसे देश के कई हिस्सों में दुर्गा अष्टमी के स्वागत और मां दुर्गा के अत्यंत सौम्य व ममतामयी स्वरूप ‘मां महागौरी ( की पूजा के रूप में मनाया जा रहा है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार अष्टमी तिथि आज यानी 18 अक्टूबर को सुबह 08:27 बजे से प्रारंभ हो रही है, जो अगले दिन यानी 19 अक्टूबर की सुबह 10:51 बजे तक रहेगी।
उदयातिथि को मानने वाले श्रद्धालु कल अष्टमी व्रत और कन्या पूजन करेंगे, वहीं जो लोग तिथि के आरंभ से साधना करते हैं, उनके लिए आज से ही मां महागौरी की विशेष आराधना का अनुष्ठान शुरू हो चुका है।
अत्यंत पावन और दिव्य: मां महागौरी का स्वरूपसनातन शास्त्रों में मां महागौरी () को साक्षात करुणा, पवित्रता और शांति की देवी माना गया है।
इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, जिसकी उपमा शंख, चांदनी या कुंद के फूलसे की जाती है। आठ वर्ष की आयु जैसी कोमलता धारण करने के कारण इन्हें आठ साल की कन्या के समान पवित्र माना जाता है। सफेद वस्त्र और श्वेत आभूषणों से सुसज्जित होने के कारण माता का एक नाम श्वेताम्बरधरा () भी है। वृषभ (बैल) की सवारी करने वाली चतुर्भुज धारी मां के ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा है और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। बाएं ऊपर वाले हाथ में डमरू है और नीचे का बायां हाथ भक्तों को वरदान देने की मुद्रा में रहता है। मां का यह शांत रूप इस बात का परिचायक है कि वे अपने भक्तों के हर मानसिक और सांसारिक क्लेश को पल भर में दूर कर देती हैं।
पौराणिक कथा: जब कठिन तपस्या से देवी को प्राप्त हुआ यह अलौकिक गौरवर्णमां महागौरी () के इस दिव्य स्वरूप के पीछे एक बेहद प्रेरक और प्राचीन पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने हजारों वर्षों तक घोर और अत्यंत कठिन तपस्या की थी। इस कठिन साधना के दौरान उन्होंने केवल कंद-मूल और वायु का सेवन किया, जिससे उनका पूरा शरीर धूप, धूल, मिट्टी और मौसम के थपेड़ों के कारण बिल्कुल काला पड़ गया था।माता पार्वती की सच्ची और अटूट निष्ठा को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। जब भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन दिए, तब उन्होंने गंगाजी के अत्यंत पवित्र और शीतल जल से माता पार्वती के शरीर को प्रेमपूर्वक धोया। गंगा जल के स्पर्श मात्र से ही माता का मैला और सांवला शरीर पूरी तरह से कुंदन की तरह दमकने लगा। उनके शरीर से एक अलौकिक दिव्य प्रकाश निकलने लगा और उनका वर्ण पूर्ण रूप से गौर हो गया।
माता के इस परम चमकीले और गोरे रूप को देखकर स्वयं महादेव ने उन्हें महागौरी नाम से संबोधित किया।एक अन्य लोक कथा के अनुसार, एक समय जब माता जंगल में तपस्या कर रही थीं, तब एक भूखा सिंह (शेर) उन्हें अपना आहार बनाने की इच्छा से वहां आ पहुंचा। लेकिन तपस्या में लीन देवी के तेज के कारण वह वहीं चुपचाप बैठ गया और माता की तपस्या पूरी होने का इंतजार करने लगा। वर्षों तक वह सिंह भी भूखा-प्यासा वहीं बैठा रहा। जब माता तपस्या से उठीं और उन्होंने देखा कि यह सिंह भी उनके साथ इतनी लंबी तपस्या का कष्ट भोग चुका है, तो उन्होंने करुणावश उसे अपना आधिकारिक वाहन स्वीकार कर लिया। इसलिए माता को सिंहवाहिनी और वृषभारूढ़ दोनों ही रूपों में पूजा जाता है।
आज की पूजा, पंचांग और आध्यात्मिक महत्वआज के दिन की पूजा का ज्योतिषीय और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बहुत बड़ा महत्व है। आज रात 11:56 बजे तक सुकर्म योग बना हुआ है, जिसे कोई भी धार्मिक या शुभ संकल्प लेने के लिए बेहद फलदायी माना जाता है। वहीं अगर वर्जित समय की बात करें तो आज शाम 04:19 बजे से शाम 05:45 बजे तक राहुकाल रहेगा, इस दौरान किसी भी नई साधना या अनुष्ठान की शुरुआत करने से बचना चाहिए।परंपराओं के अनुसार आज के दिन बैंगनी रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है, जो आध्यात्मिक चेतना और आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। मां महागौरी को नारियल का भोग लगाना सबसे प्रिय माना जाता है। आज के दिन नारियल या नारियल से बनी मिठाइयों का दान करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में मां महागौरी का यह रूप हमें सिखाता है कि बाह्य रूप-रंग की परवाह किए बिना आंतरिक पवित्रता, कठिन परिश्रम और आत्मिक शुद्धि से जीवन के किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
