
मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों को साफ-सुथरा बनाने के दावों की हवा निकालने वाली एक बड़ी रिपोर्ट सागर जिले से सामने आई है। केंद्र सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत गांवों में सफाई व्यवस्था सुधारने के नाम पर लाखों रुपये तो पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी वैसी ही ढाक के तीन पात बनी हुई है। सरकारी खजाने से मोटी रकम खर्च होने के बाद भी गांवों में कचरे के ढेर लगे हुए हैं।
70 लाख रुपये खर्च, पर नतीजा बिल्कुल शून्य
पूरा मामला सागर जिले की 11 जनपद पंचायतों के तहत आने वाली 765 ग्राम पंचायतों का है। इन गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) को दुरुस्त करने के लिए सरकार ने करीब ₹70 लाख का भारी-भरकम बजट मंजूर किया था। इस राशि से अलग-अलग पंचायतों के लिए 518 कचरा रिक्शा (ट्राइसाइकिल) खरीदे गए थे, ताकि सफाईकर्मी हर घर से सूखा और गीला कचरा उठा सकें। लेकिन अफ़सोस, यह पूरी योजना सिर्फ कागजों और बिलों तक ही सीमित रह गई।
पंचायत भवनों में जंग खा रहे हैं रिक्शा
हैरानी की बात यह है कि इन 518 रिक्शों में से एक बड़ा हिस्सा कभी सड़क पर उतरा ही नहीं। कई पंचायतों में उचित रखरखाव, सफाई कर्मचारियों की कमी या फिर अधिकारियों की उदासीनता की वजह से ये महंगे रिक्शा पंचायत भवनों या सरकारी परिसरों के बाहर खड़े-खड़े धूप और बारिश में कबाड़ हो रहे हैं। नई चमचमाती गाड़ियां अब जंग खा चुकी हैं और टायर सड़ रहे हैं।
जनता के टैक्स के पैसे की खुली बर्बादी
लाखों रुपये के इस साजो-सामान के बर्बाद होने से ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि जब सरकार को सफाई करानी ही नहीं थी, तो इतनी महंगी गाड़ियां खरीदकर जनता की गाढ़ी कमाई को क्यों फूंका गया? गांवों में आज भी नालियां चोक हैं और लोग घरों का कचरा खुले रास्तों या खाली प्लाटों में फेंकने को मजबूर हैं, जिससे बीमारियां फैलने का खतरा लगातार बना हुआ है। अब इस खुली वित्तीय अनियमितता पर जिले के वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।
| योजना का नाम | कुल स्वीकृत बजट | खरीदे गए रिक्शा | वर्तमान स्थिति (Status) |
|---|---|---|---|
| स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) | करीब ₹70 लाख | 518 कचरा रिक्शा | देखरेख के अभाव में खड़े-खड़े कबाड़ हो रहे हैं |
