
16 अक्टूबर 2026। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व का आज छठा दिन है। आज का दिन आदि शक्ति दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित है। देश भर के घरों और पूजा पंडालों में सुबह से ही माता के इस अत्यंत महिमामयी रूप की पूजा-अर्चा की जा रही है। आज के दिन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत गहरा है, क्योंकि मां कात्यायनी को साहस, न्याय और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देने वाली देवी माना जाता है। इसके साथ ही, आज से बंगाल की परंपरा के अनुसार देवी बोधन और आमंत्रण के साथ मुख्य दुर्गा पूजा की भी शुरुआत हो रही है।
मां कात्यायनी का स्वरूपशास्त्रों में मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत भव्य और चमकीला बताया गया है। स्वर्ण के समान आभा वाली माता सिंह पर सवार हैं। उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दाहिनी ओर की भुजाएं अभय और वरद मुद्रा में हैं, जो भक्तों को सुरक्षा और आशीर्वाद देती हैं। वहीं बाईं ओर की भुजाओं में माता ने चंद्रहास तलवार और कमल का फूल धारण किया हुआ है। यह स्वरूप एक तरफ उनकी ममता को दिखाता है, तो दूसरी तरफ दुष्टों के संहार के लिए उनके भीतर के शौर्य को भी प्रकट करता है।
कैसे पड़ा ‘कात्यायनी’ नाम?
(पौराणिक कथा)माता के इस स्वरूप के जन्म के पीछे एक बेहद सुंदर और प्रेरणादायक कथा है। प्राचीन काल में कात्यायन गोत्र में महर्षि कात्यायन नाम के एक महान ऋषि रहते थे। वे मां भगवती के परम भक्त थे और उनकी कठोर तपस्या करते थे। महर्षि कात्यायन की इच्छा थी कि स्वयं आदि शक्ति उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माता ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान दे दिया।उसी काल में महिषासुर नाम के राक्षस का अत्याचार तीनों लोकों में बहुत बढ़ गया था। देवताओं के सुख-चैन छीन चुके थे और कोई भी उसका सामना करने में सक्षम नहीं था। तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से आदि शक्ति का प्राकट्य हुआ। चूंकि महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले देवी की पूजा की और वे ऋषि कात्यायन की पुत्री कहलाईं, इसलिए उनका नाम मां कात्यायनी पड़ा।
ऋषि के आश्रम में जन्म लेने के बाद माता ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा। माता और महिषासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ और अंततः अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को माता ने महिषासुर का वध कर दिया, जिसके कारण उन्हें ‘महिषासुरमर्दिनी’ भी कहा गया।
आज के दिन की विशेष परंपराएं और महत्व• शहद का भोग:
आज के दिन मां कात्यायनी को प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से शहद का भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि शहद का भोग लगाने से साधक के जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और उसकी वाणी व व्यक्तित्व में मिठास आती है।
• हरे रंग का महत्व:
नवरात्रि के छठे दिन हरे रंग के वस्त्र पहनना बेहद शुभ माना जाता है। हरा रंग प्रकृति, तरक्की, शांति और नई शुरुआत का प्रतीक है।• विवाह बाधा दूर करने के लिए: ऐसी मान्यता है कि जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही हो या जो सुयोग्य जीवनसाथी की कामना रखती हैं, उनके लिए मां कात्यायनी की पूजा अत्यंत फलदायी होती है। द्वापर युग में गोपियों ने भी भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए माता कात्यायनी की ही पूजा की थी।आज ‘सरस्वती आवाहन’ भी हैनवरात्रि के छठे दिन का एक और विशेष पहलू है—सरस्वती आवाहन। आज के दिन ज्ञान, कला और बुद्धि की देवी मां सरस्वती को अपने जीवन और घर में आमंत्रित किया जाता है। विशेषकर विद्यार्थियों और कला से जुड़े लोगों के लिए आज का दिन मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और आत्मबल मजबूत करने का एक सुंदर अवसर लेकर आता है।जीवन के लिए संदेशमां कात्यायनी की कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के जीवन के लिए भी एक बड़ा संदेश है। यह दिन हमें सिखाता है कि जब हमारे जीवन में परेशानियां या नकारात्मक परिस्थितियां (जो महिषासुर का प्रतीक हैं) बढ़ने लगें, तो हमें चुपचाप बैठकर अन्याय को सहना नहीं चाहिए। माता का यह रूप हमें अपने भीतर के डर को खत्म करने, अपनी जिम्मेदारियों को पहचानने और सही बात के लिए खड़े होने का साहस देता है।
